जो रंग पहनती थी,
उसे रंगीन बना देती थी
जिस जगह जाती थी,
उसे हसीन बना देती थी
हर इक महफिल की,
जान थी वो
मेरे जैसे अनजानों की,
पहचान थी वो
हंसी को हंसना,
सिखाती थी वो
उदास चेहरों में,
उम्मीद जगाती थी वो
छोटा हो या बड़ा,
कुछ मतलब नहीं था
हर किसी के सुख,
दुख में जाती थी वो
संगीत की धुन सुनतें ही,
पैर अपने आप उठ जाता था
बड़ो को देखते ही,
सिर ख़ुद ही झुक जाता था
दोस्तों के लिये,
दोस्ती का पैमाना थी वो
कुछ वक्त नहीं मेरे लिए,
ज़माना थी वो
दिन हो या रात,
उसकी यादों में खो जाता हूं
कानो में चुपके कुछ कहती है,
तो सूकून से सो जाता हूं
शमिंदर कौर रंजीत